Thursday, March 15, 2007

अनुराग मुस्कान: पत्रकारिता से प्रेतकारिता तक (व्यंग्य)

रंगीले की ख़बर
-अनुराग मुस्कान
मेरे पड़ोस में रहने वाले बबलू रंगीला उम्र पच्चीस वर्ष और उसके सामने रहने वाली छबीली उम्र इक्कीस वर्ष ने कल जहर खा लिया। सुना है मामला प्रेम-प्रसंग का था और दोनों पक्षों के परिवारवाले बबलू रंगीला और छबीली की शादी के घोर एवं कट्टर विरोधी थे। ताजा खबर यह है कि रोज-रोज होने वाले परिवारिक पंगों से हार कर किए गए इस आत्महत्या के प्रयास में बबलू रंगीला तो जीत गया लेकिन छबीली हार गई। पूरी रात छबीली का इलाज चला और उसे बचा लिया गया। हालांकि उसकी हालत अब भी गंभीर बनी हुई है। बेहोशी की हालत में भी वह बस बबलू-बबलू पुकार रही है। मैंने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत एक खबरिया चैनल में कार्यरत अपने एक रिपोर्टर मित्र को फोन लगाया और उन्हे पूरी घटना का ब्योरा देते हुए इस पर एक ऐसी रिपोर्ट बनाने की पेशकश की जिसे देखकर लोग जान सकें की अंतर्जातीय विवाह के विचारों का स्वागत करने का दम भरने वाले समाज में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो अपनी संकुचित मानसिकता के आगे किसी स्वस्थ विचार को पनपने ही नहीं देते।
मित्र ने पूरी कहानी सुनकर पहले तो इस घटना पर गहरा अफसोस जताया और फिर सवाल दागा, 'कहीं ऐसा तो नहीं है अनुराग भाई कि इस लड़की छबीली पर उसका मामा या चाचा बुरी नजर रखता हो और इसी के चलते बबलू को धमकाया जाता रहा हो, आजकल ऐसा बहुत हो रहा है न।'
'नहीं-नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है, बल्कि पारिवारिक प्रताड़ना और उत्पीड़न की वजह से ही दोनों ने ऐसा कदम उठाया है।' मैंने स्पष्ट किया।
'ओह-हो, यह तो मामला गड़बड़ हो गया, मामा-चाचा की सैटिंग का कोई सीन नहीं है तो कम से कम छबीली पर बुरी नजर रखने वाला अड़ोस-पड़ोस का ही कोई लड़का होता। लव ट्रायंगल तो होना ही चाहिए था, खबर में कुछ तो जान आती, अभी तो सब कुछ एकदम फ्लैट यानि सीधा-सपाट है, ट्रायंगल तो छोड़ो इसमें तो कोई एंगल ही नजर नहीं आता और वैसे भी आत्महत्या करना तो अपराध की श्रेणी में आता है, हम अपराध को ग्लोरिफाई तो कर नहीं सकते हैं न।' मित्र मुझे समझाने लगे।
'अरे, लेकिन किसी को आत्महत्या करने के लिए बाध्य करना भी तो बड़ा अपराध है।' मैंने कहा।
'अमां यार, अब हम भी तुम्हारी तरह इमोश्नल होने लगे तो बटोर ली हमने टीआरपी, रोज मोहब्बत में सैंकड़ों लोग जान देते और लेते हैं, सबकी खबर दिखाने लगे तो हमारे चैनल पर तीन सौ पैंसठ दिन चौबीसों घंटे बस यही ड्रामा चलता रहेगा। देखो, टीवी पर आने के लिए खबर में स्कोप होना चाहिए, खबर का बिकाऊ होना बहुत जरूरी है, समझे।' मित्र मेरी खिल्ली सी उड़ाते बोले।
'तो इसका मतलब यह हुआ कि इस घटना पर कोई खबर नहीं बन सकती और इस मामले का किसी खबरिया चैनल पर कोई भविष्य नहीं है?' मैं हताशा था।
'हिम्मत मत हारो दोस्त, इस घटना पर खबर भी बन सकती है और इसका सुनहरा भविष्य भी हो सकता है, लेकिन इसके लिए हमें और तुम्हे थोड़ा इंतजार करना होगा।'
'इंतजार, मैं कुछ समझा नहीं?' मैंने पूछा।
'बस तुम उस लड़की छबीली पर नजर रखो, हो सकता है कि वह बबलू की याद में पागल हो जाए, तब इसमें प्रेम दीवानी वाला हिट एंगल खोजा जा सकता है। हम दिखा सकते हैं कि प्रेम में केवल मजनूं ही नहीं लैलाएं भी पागल हो सकती हैं, 'बौरा गई छबीली' के टाइटल से हम इस पर देर तक खेल सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि छबीली आगे चलकर किसी नाग पर पूर्वजन्म का बबलू होने का दावा कर दे। पुनर्जन्म में किसी के भी नाग-नागिन बन जाने वाले एंगल तो किसी भी चैनल के लिए ब्लॉक बस्टर हैं। इस सब्जेक्ट पर प्रोग्राम बनने से पहले ही बिक जाता है। प्रोग्राम का टाइटल हम रखेंगे, 'बबलू बना नाग?', इस प्रोग्राम में नाग पर फोकस के साथ स्टूडियो में लड़की के अलावा कुछ एक्सपर्टस् भी होंगे। लड़की कहेगी यह नाग नहीं बबलू है, एक्सपर्ट कहेंगे यह बबलू नहीं नाग है। इस झगड़े से फिक्शन क्रिएट होगा, वही हमें चाहिए होता है। हम इस मसले पर टोल फ्री नंबर और एसएमएस का फंड़ा भी आजमा सकते हैं। या फिर कुछ नहीं तो ऐसा ही हो जाए की बबलू रंगीला भूत बनकर लोगों को परेशान करने लगे, हिमेश रेशमिया के किसी गाने पर नाचने लगे तो समझो मामला फिट ही नहीं हिट भी है। हम किसी को भी न दिखने वाले बबलू रंगीला का भूत देर तक प्राइम टाइम में दिखा सकते हैं। इस प्रोग्राम का नाम भी हम धांसू टाइप रखेंगे जैसे, 'भूत मांगे इंसाफ' या 'एक भूत की लव स्टोरी', मामला जम जाएगा।'
'और अगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तब क्या करोगे महाशय?' मैंने जानना चाहा।
'तब, तब तो हमें छबीली के मरने का इंतजार करना होगा यार, फिर कुछ सालों बाद हम उस इलाके में एक-दूसरे से लिपटे नाग-नागिन को ढ़ूंढ़ निकालेंगे और कहेंगे यह हैं पूर्वजन्म के बबलू रंगीला और छबीली जिनका नाग-नागिन के रूप में पुनर्जन्म हुआ है। खास तौर पर प्राइम टाइम के लिए हम, 'तू मेरा नाग मैं तेरी नागिन' के टाइटल से एक धमाकेदार शो बनाएंगे जिसमें बबलू रंगीला और छबीली के प्रेम प्रंसगों के नाट्य रूपांतर के साथ नाग-नागिन के लिपटा-चिपटी के दृश्य दिखाकर हम एक दिन के लिए ही सही लेकिन सारी की सारी टीआरपी लूट लेंगे।'
मित्र की बातें सुन कर मुझे आज से तीन साल पहले उनसे हुई मुलाकात याद आ गई जब मित्र अखबार छोड़कर टीवी में जा रहे थे। तब मुझे लगा था कि मेरे मित्र अपनी कुशाग्र बुद्धि का समायोजन जब दृश्यों के साथ करेंगे तो पत्रकारिता जगत में क्रांति आ जाएगी। खैर, इतना तो कह सकता हूं कि 'क्रांति' तो आई है। एक क्रांति के बदले हमें इस देश में लोकतंत्र स्थापित करने की आजादी मिली थी और अब देख रहा हूं कि मित्र वाली क्रांति से खबर के नाम पर मनमाने ढ़ंग से कुछ भी दिखाने और उसे जबरदस्ती थोपने की भरपूर आजादी लूटी जा रही है। पत्रकारिता की डोर अब पत्रकारों के हाथ से छूटकर नाग-नागिनों और भूत-प्रेतों के हाथों में जो चली गई है।


(12/11/2006 को रविवारी जनसत्ता में प्रकाशित)

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