Saturday, April 7, 2007

'मुफ़्त'... 'मुफ़्त'... 'मुफ़्त'

मुफ्त जो मिले तो बुरा क्या है...

सुबह-सुबह का वक़्त था। मैं दिल्ली के साउथ एक्स. पार्ट- वन के बस स्टॉप पर खड़ा नौएडा जाने वाली बस के इंतजार में था। बस स्टॉप पर अच्छी-खासी भीड़ थी। तभी एक उन्नीस-बीस साल का लड़का हाथों में एक प्रतिष्ठित दैनिक अंग्रेजी अखबार का बंडल थामे वहां पहुंचा और एक-एक करके वहां खड़े सभी लोगों को अखबार की एक-एक प्रति बांटने लगा। लोग उस लड़के से कुछ पूछे बिना ही वह प्रतियां स्वीकार करने लगे। कुछ लोग जो बस स्टॉप से थोड़ी दूर या फिर आसपास खड़े थे, वह भी अखबार मुफ्त में बंटता देख उस लड़के की ओर लपके। इन लोगों में वह लोग भी शामिल थे जो वहां स्थित विभिन्न व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में सेल्समैन और हैल्पर के रूप में कार्यरत रहे होंगे और अपने मालिक द्वारा शोरूम और दुकानें खोले जाने का इंतजार कर रहे थे। पहले लोगों ने समझा कि शायद अखबार का मुफ्त वितरण कंपनी की ही कोई पॉलिसी होगी, फिर सोचा की शायद वह विज्ञापनदाता अखबार मुफ्त बंटवा रहा होगा जिसके विज्ञापन का स्टीकर अखबार के मुख्य पृष्ठ पर चिपका है। लेकिन यह क्या? लोग उस वक़्त सन्न रह गए जब वह लड़का सारे अखबार बांटकर सबसे अखबार के पैसे मांगने लगा। दो रुपए का अखबार मुफ्त समझ कर लपक चुके लोगों के चेहरे शर्मिंदगी की लालिमा के साथ झुंझुला उठे। कुछ ने, 'नहीं चाहिए भाई।', कह कर अखबार वापस कर दिया और कुछ ने 'मुफ्त' की मानसिकता का प्रदर्शन करने से बचने के लिए अनमने मन से पैसे दे दिए। पैसे तो खैर मैंने भी दिए लेकिन साथ ही उससे इस तरह जबरदस्ती अखबार बेचने का कारण भी पूछा।

अपना नाम उसने पूरन बताया। उसने मुझे बताया कि वह इंटर पास है और नौकरी की तलाश में गोरखपुर के पास किसी गांव से आया है। दिल्ली आकर उसने नौकरी के लिए बहुत धक्के खाए लेकिन सिफारिश और गवाही के अभाव में उसे कहीं काम नहीं मिला। हार कर उसने फुटपाथ पर अखबार बेचने का काम शुरू किया लेकिन वहां भी उसे पुलिसवाले और आसपास रेहड़ी लगाने वाले परेशान करते रहे। पुलिसवाले रोज चार-पांच अखबार बतौर रिश्वत उससे ले जाते और आसपास पानी, जूस और चाट-पकौड़ी की रेहड़ी लगाने वाले उसे अपनी जगह पर बैठा बता कर खदेड़ दिया करते। अंततः पेट पालने की मजबूरी ने उसके दिमाग में तरकीब का रूप ले लिया। वह भीड़भाड़ वाली जगहों पर ऐसे ही अखबार बेचने लगा जैसे उसने कुछ देर पहले इस बस स्टॉप पर बेचे थे। उसने लोगों की प्रवृतियों का गहन अध्ययन किया। मुफ्त चीजों के प्रति लोगों के आकर्षण पर उसका शोध देखकर मैं भी हैरत में था। लोगों की मानसिकता, मुफ्त जो मिले तो बुरा क्या है को वह भलिभांति समझ चुका था। लोगों में मुफ्त के प्रति इसी मानसिकता के पीछे छिपी लालसा और लालच को शर्मिंदा करके पैसे कमाना ही उसका व्यवसाय था। उसकी मार्केटिंग स्किलस् ने मुझे अचंभित कर दिया।

मुझे उसकी सेल्समैनशिप में कोई खामी नजर नहीं आई। लोगों की कमजोरी का फायदा उठा कर अपना माल बेचना उसकी योग्यता थी, चालाकी नहीं। दरअसल 'मुफ्त' के तिलिस्म ने लोगों को इस स्तर तक सम्मोहित कर लिया है कि उन्हे खुद को ठगे जाने का अहसास तक नहीं होता। आजकल छोटी-बड़ी तमाम कंपनियां यही तो कर रही हैं। अपने उत्पाद पर दस रुपए बढ़ाकर पांच रुपए की चम्मच, कटोरी, गिलास, शैम्पू के पॉउच, साबुन की टिक्की और बिस्कुट के पैकट मुफ्त देकर उपभोक्ताओं को मूर्ख बनाया जा रहा है। घर के दरवाजे से लेकर टीवी के पर्दे तक मुफ्त सामान का लालच देकर ऊट-पटांग और बेकार उत्पाद बेचने वाली कंपनियों की भीड़ है। पूरन तो दो रुपए मूल्य का अखबार दो ही रुपए में बेच रहा था। हां, उसका तरीका थोड़ा समझ से परे जरूर हो सकता है लेकिन इसमें उसकी भी क्या गलती, बाजार के विस्तार के साथ अपना माल बेचने के लिए रोज नए फंडे तलाश करना सबकी मजबूरी है, फिर चाहे वह अखबार हो या मोबाइल, टीवी और फ्रिज। लोगों में 'मुफ्त' का संक्रमण किसी बीमारी की तरह फैल रहा है। मैंने तो कई लोगों को किसी उत्पाद पर स्कीम में मुफ्त मिल रहे पांच या दस रुपए के आइटम के दुकान पर ही छूट जाने के बाद उसे बीस रुपए का पैट्रोल खर्च करके लाते देखा है। किसी उत्पाद के साथ स्कीम में मिल रहा मुफ्त आइटम उपभोक्ता का हक है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन धीरे-धीरे लोगों की आदत में शुमार होती जा रही 'मुफ्त' की प्रवृति का लाभ पूरन जैसे लोगों से लेकर छोटी-बड़ी कंपनियां भी अपने-अपने तरीके से उठा रही हैं।

इस कहानी की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यही है कि पूरन जैसे दिमाग जो देश और समाज के हित कार्यों में लगाए जा सकते हैं, वो फिलहाल सिर्फ अपना हित साधने में लगे हैं। उन्हे देश और समाज के लिए सोचने का अवसर देना तो दूर कोई एक अदद नौकरी तक नहीं देता। क्या आपमें से है किसी के पास पूरन के लिए एक अदद नौकरी....???????

6 comments:

Jagdish Bhatia said...

पूरन अपनी तरकीब आजमाने हर रोज कोई नया ठिकाना खोज लेता होगा क्योंकि एक ही जगह पर उसकी दाल रोज रोज तो नहीं गलती होगी।
आप तो कल भी यहीं लिखेंगे :)

Anonymous said...

पूरन तो मजबूरी से मजबूर हो मुफ्त वाला लॉजिक लगा रहा था, आपको तो मासाअल्लाह काफी लोग पढते हैं फिर ये मुफ्त का लॉजिक क्यों ;)

Udan Tashtari said...

एक प्रचलित लोकोयुक्ति है "काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती" ...आज तो बढ़िया चढ़ गई. अब अगली बार?? हा हा :)

अनुराग मुस्कान said...

प्रिय भाटिया साहब, तरुण जी और उड़न तश्तरी के मालिक समीर लाल जी, देखा न आपने 'मुफ़्त' के लेबल का जादू... लगता है आप लोग पूरन की कहानी सुनाने से पहले किए गए मेरे व्यंग्य को ठीक से समझ नहीं पाए:( आप सुधि लोगों ने उस चुटकी को दिल पर ले लिया... अब इसके सिवा क्या कहूं कि... दिल पे मत ले यार...:) आगे आप खुद समझदार हैं... बहरहाल, शीर्षक और अपील को कोई और आपकी तरह 'मुफ़्त वाला लॉजिक' और 'काठ की हांडी' समझे इससे पहले मैं इसे बदल रहा हूं... जिससे आपकी तरह कोई और इससे ठगा हुआ महसूस न करे;)

Jagdish Bhatia said...

अनुराग आपने कैसे सोच लिया कि हमने इसे दिल पे ले लिया।
हम तो सिर्फ यह समझाना चाहते थे कि टीआरपी के फंडे यहां नहीं चलते भाई :)
बातों को दिल पे लेने की जगह नहीं है यह।

Udan Tashtari said...

:) निश्चिंत रहो, बिंदास लिखो. यहाँ बातें दिल से लगाने का फैशन नहीं है, भाई!!

-बस आपने मौज की और हमने मस्ती. :)